
राष्ट्रीय सुरक्षा का मौन उल्लंघन—घुसपैठिए और दस्तावेज़ों का संकट
“पहचान पत्र असली, नागरिकता नकली—यह लोकतंत्र पर ‘गुरिल्ला हमला’ है!”
लखनऊ में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के संबंध में नगर निगम की कार्रवाई के दौरान हुआ खुलासा राष्ट्रीय सुरक्षा, कानूनी ढाँचे और सामाजिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह मामला केवल स्थानीय प्रशासन की चिंता का विषय नहीं है; यह भारत की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती देने वाला एक गहन, संगठित और राष्ट्रीय स्तर का संकट है।
## विधिक और संवैधानिक संकट
इस खुलासे का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ये घुसपैठिए स्वयं को असम के बारपेटा जिले का निवासी बताते हुए आधार कार्ड, वोटर आईडी और NRC से संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत कर रहे हैं।
* पहचान की चोरी: यदि ये दस्तावेज़ फर्जी हैं, तो यह पहचान की जालसाज़ी (Identity Fraud) का बड़ा मामला है। यदि ये दस्तावेज़ असली हैं (यानी इन्हें भारत में रहते हुए कानूनी प्रक्रिया के तहत प्राप्त किया गया है), तो यह हमारे नागरिकता सत्यापन तंत्र की पूर्ण विफलता है।
* कानूनी शून्य: यह स्थिति उस कानूनी शून्य को उजागर करती है जिसका लाभ ये समूह उठा रहे हैं। घुसपैठियों को दस्तावेज़ मिलना हमारी प्रशासनिक मशीनरी में भ्रष्टाचार, लापरवाही और क्षेत्रीय राजनीति के हस्तक्षेप को दर्शाता है। यह संविधान के तहत सभी नागरिकों के हितों की रक्षा करने की राज्य की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है।
## Geopolitana – राजनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का आयाम
घुसपैठियों द्वारा ‘गुरिल्ला शैली’ में झुग्गी-झोपड़ियों में बसने और एक ‘तय पैटर्न’ पर काम करने की बात अधिकारियों की चिंता को बढ़ाती है।
* संगठित घुसपैठ: यह दर्शाता है कि यह मौसमी प्रवासन नहीं, बल्कि संगठित घुसपैठ का एक तरीका है, जिसका उद्देश्य भारत की नागरिक पहचान में घुलमिल जाना है।
* जनसांख्यिकीय बदलाव: शहर की 7,335 झुग्गी-झोपड़ियों में एक विशेष समुदाय की बड़ी आबादी का निवास, जनसांख्यिकीय संतुलन को बिगाड़ने का खतरा पैदा करता है। यह क्षेत्रीय राजनीति में नए दबाव समूह पैदा कर सकता है और स्थानीय संसाधनों पर अनावश्यक बोझ डाल सकता है।
* सुरक्षा का खतरा: राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से, अच्छी तरह से प्रलेखित अवैध घुसपैठिए जासूसी, तस्करी और उग्रवाद जैसी राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं।
## सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती
लखनऊ का यह मामला एक बड़ा सामाजिक और प्रशासनिक बोझ है:
* संसाधनों पर दबाव: ये समूह स्थानीय संसाधनों (पानी, बिजली, स्वास्थ्य सेवा) का उपयोग करते हैं, जिससे वैध नागरिकों के लिए संसाधनों की कमी होती है।
* सत्य पर पर्दा: इन लोगों द्वारा असम के बारपेटा जिले का नाम बताना अंतर-राज्यीय सत्यापन को जटिल बनाता है। यह असम के NRC प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी परोक्ष रूप से प्रश्नचिह्न लगाता है।
## तीव्र प्रतिक्रिया की आवश्यकता
प्रशासन की यह घोषणा कि ‘गहन जांच कराई जाएगी और सख्त कार्रवाई होगी’, केवल एक शुरुआत होनी चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर त्वरित और बहुआयामी कार्रवाई आवश्यक है:
1. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की संलिप्तता: चूंकि इसमें संगठित नेटवर्क और फर्जी दस्तावेज़ीकरण शामिल है, यह मामला केवल नगर निगम या स्थानीय पुलिस का नहीं है। NIA को इस पहचान जालसाज़ी के स्रोत की जाँच करनी चाहिए।
2. दस्तावेज़ों का पुन: सत्यापन: सभी संवेदनशील क्षेत्रों में आधार, वोटर आईडी और राशन कार्ड का राष्ट्रव्यापी, युद्धस्तर पर पुन: सत्यापन अभियान चलाया जाना चाहिए।
3. अंतर-राज्यीय समन्वय: सभी सीमावर्ती राज्यों (विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम) को उत्तर प्रदेश जैसे आंतरिक राज्यों के साथ डेटा और खुफिया जानकारी साझा करने के लिए एक समर्पित नोडल एजेंसी बनानी चाहिए।
जब घुसपैठिए ‘पहचान पत्र’ को अपनी ढाल बना लें, तो समझ लेना चाहिए कि देश की सुरक्षा केवल सीमा पर नहीं, बल्कि हमारे प्रशासनिक और राजनीतिक संस्थानों की ईमानदारी पर निर्भर करती है। इस राष्ट्रीय संकट को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को अंदर से खोखला कर देगा।


